क़ैद से अपनी रिहाई दे रही है आख़िरी है
आशिक़ी जैसे विदाई दे रही है आख़िरी है
हर तरफ़ ख़ामोशियाँ हैं और इन ख़ामोशियों में
चीख जो दिल की सुनाई दे रही है आख़िरी है
बे-ख़बर इस राह पर बे-फ़िक्र चलते जा रहे हो
दूर जो मंज़िल दिखाई दे रही है आख़िरी है
आज बूढ़ी माँ जो अपने काँपते हाथों से तुम को
चार आने की कमाई दे रही है आख़िरी है
ये तुम्हारी मौत पर इतनी इकट्ठी भीड़ है जो
ज़िंदगी तुम को बधाई दे रही है आख़िरी है
— Prashant Prakhar















