फ़रेबी, झूठ कहती जा रही है
मुझे क्या क्या समझती जा रही है
ये सोंचा था पकड़ ली रेत मैंने
मगर ये तो फिसलती जा रही है
बचा लो यार इस दरियादिली को
निगाहों से उतरती जा रही है
भरोसा क्या करूँँ मैं ज़िन्दगी का
ये तो बातें बदलती जा रही है
ज़हर कैसा हवा में घुल गया ये
मेरी तबियत बिगड़ती जा रही है
तुम्हारे बाद मैं भी क्या करूँँगा
सो ये अब 'उम्र ढलती जा रही है
मेरे हाँथो में छाले पड़ गए हैं
मगर किस्मत बदलती जा रही है
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Prashant Sitapuri
our suggestion based on Prashant Sitapuri
As you were reading Hawa Shayari Shayari