गरजती है बरसती है मनाती है वही लड़की

परीशाँ जब भी होता हूँ हँसाती है वही लड़की

शिकायत करती है वो भी मगर अंदाज़ ऐसा है
लिपटती है गले कस के लगाती है वही लड़की

जहाँ में जितनी ख़ूबी हैं मुझे सब उस
में दिखती हैं
न कोई और मुझ को सिर्फ़ भाती है वही लड़की

वो कितनी ख़ूब-सूरत है मैं सब को अब बताऊँगा
हुआ है ये मेरे सपनों में आती है वही लड़की

हँसी में जब भी कहता हूँ मैं तुम को भूल जाऊँगा
रो-रोकर यार तब ग़ुस्सा दिखाती है वही लड़की

न जाने क्या क्या कहती है मेरे बीमार होने पर
मुझे सच में बहुत बातें सुनाती है वही लड़की

— Prashant Sitapuri

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