इन आँखों में बसाई इस नमी का दुख समझते हैं
उजाले कब घरों की तीरगी का दुख समझते हैं
हमें खुलकर बताएं तो उदासी का सबब क्या है
हम ऐसे लोग हैं जो हर किसी का दुख समझते हैं
मैं ने ये सोचकर ही आपसे दुख कह दिया अपना
यही की आप सोज़-ए-ज़िंदगी का दुख समझते हैं
हमारे दुख से उन को भी नहीं है वास्ता कोई
हमारे दोस्त तो बस शायरी का दुख समझते हैं
किसी लोहे को पीतल क्या कभी भी काट सकता है
या केवल आदमी ही आदमी का दुख समझते हैं
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