जितने मिले हैं ग़म मुझे उतनी ख़ुशी मिले
ऊपर से शर्त ये भी मेरी हर घड़ी मिले
करते हैं ख़ार जैसे हिफ़ाज़त गुलाब की
वैसे ही तेरे हुस्न को इक आदमी मिले
किन बस्तियों को कर गया रौशन तू मेरे यार
अंधों को थी ग़रज़ कि उन्हें रौशनी मिले
थोड़ी गुज़ार दी है किसी बे-वफ़ा के साथ
थोड़ी गुज़ारनी है अगर दूसरी मिले
ख़ुशियाँ टिकी हुकूमती उन काग़ज़ात पर
वो काग़ज़ात जिन से मुझे नौकरी मिले
— Prashant Sitapuri















