कोई जहाँ में ख़ूब-रु इतना नहीं हुआ
मानिंद उस के कोई भी चेहरा नहीं हुआ
लगता है जंग-ए-इश्क़ में उतरा नहीं कोई
उल्फ़त में इन दिनों कोई शैदा नहीं हुआ
पहले तो आँख काम में लाई गई मेरी
फिर बा'द में कहा कि मैं दरिया नहीं हुआ
तुम लोग भी यक़ीन मुहब्बत में कर रहे
या'नी तुम्हारे साथ में धोखा नहीं हुआ ?
कैसे करें उरूज की बातें किसी से हम
कुछ भी तो अपने साथ में अच्छा नहीं हुआ
इस बात की ख़ुशी नहीं बेटी हुयी है घर
हम इस लिए दुखी हैं कि बेटा नहीं हुआ
कोई नहीं जो मुझ को दु'आओं में माँग ले
या'नी किसी का मैं कभी सपना नहीं हुआ
— Prashant Sitapuri















