किसी बीमार के ख़ातिर दवा सी ख़ूब-सूरत हो
मेरी फ़्यूचर शरीक-ए-जाँ बला-सी ख़ूब-सूरत हो
मैं वो बिल्कुल नहीं जो देखता हूँ सिर्फ़ लहजा ही
सो उस की बात भी बाद-ए-सबा-सी ख़ूब-सूरत हो
कि जैसे ये झगड़ना यार ज़ात-ए-पाक है अपना
मुहब्बत भी क़लंदर की दुआ-सी ख़ूब-सूरत हो
लबों पे थोड़ी ख़ामोशी व माथे पर शिकन रखना
शिकायत आप की मानो क़ज़ा-सी ख़ूब-सूरत हो
मेरी चाहत वो मेरी ग़लतियों पर जब करे ग़ुस्सा
तो वो नाराज़गी भी इल्तिजा-सी ख़ूब-सूरत हो
— Prashant Sitapuri















