किसी बीमार के ख़ातिर दवा सी ख़ूबसूरत हो
मेरी फ़्यूचर शरीक-ए-जाँ बला-सी ख़ूबसूरत हो
मैं वो बिल्कुल नहीं जो देखता हूँ सिर्फ़ लहजा ही
सो उसकी बात भी बाद-ए-सबा-सी ख़ूबसूरत हो
कि जैसे ये झगड़ना यार ज़ात-ए-पाक है अपना
मुहब्बत भी क़लंदर की दुआ-सी ख़ूबसूरत हो
लबों पे थोड़ी ख़ामोशी व माथे पर शिकन रखना
शिकायत आपकी मानो क़ज़ा-सी ख़ूबसूरत हो
मेरी चाहत वो मेरी ग़लतियों पर जब करे ग़ुस्सा
तो वो नाराज़गी भी इल्तिजा-सी ख़ूबसूरत हो
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