Prit
Prit
Ghazal

शायद उस ने कभी वफ़ा की ही नइँ

जो ये कहता है आँखें बोलती नइँ

किसी पे इक दफ़ा दिल आ जाए
बंदा क्या फिर तो रब की चलती नइँ

तेरी ख़ामोशी भी सुनी मैं ने
तू ने आवाज़ भी मेरी सुनी नइँ

घर से दफ़्तर तलक सफ़र है सिर्फ़
मौत है जानी फिर ये ज़िंदगी नइँ

उस को कैसे बुरी लगी मेरी बात
बात भी वो कभी जो मैं ने की नइँ

उसे बिन देखें देख लेते हैं हम
वो हमें देख कर भी देखती नइँ

आप कुछ ज़्यादा अपने आप से हैं
वरना मुझ में तो कोई भी कमी नइँ

कभी चुप रह के कितना कहती है
कभी वो बोलकर भी बोलती नइँ

'प्रीत' आज़ादी ऐसी जैसे हो क़ैद
क़ैद ऐसी जहाँ गिरफ़्तगी नइँ

— Prit

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