"तुम्हारा ख़याल"
भोर में सूरज की हल्की रौशनी से
जब नदी का जल चमक जाता है
तुम्हारा अक्स मुझे नज़र आता है
निशा में; महताब की चाँदनी तले
टिमटिमाते तारों को देखता हूँ
तुम्हारा चेहरा निखर आता है
हल्की बारिश के बा'द
मिट्टी से आने वाली गंध सी हो तुम
किसी पवित्र ग्रंथ सी हो तुम
लापता हूँ मैं ख़ुद ही में
मुझ
में बसी हो तुम
रूह की रूहानियत हो
आँखों की नमी हो तुम
तुम्हारी आवाज़
कोयल की मीठी बोली सी लगती हँ
तुम हो तो मैं हूँ
तुम्हीं से मेरी साँसे चलती हैं
पंछियों की चहचहाहट से
तुम्हारा मुस्कुराना याद आता है
जब भी इबादत करे 'प्रीत'
तुम्हारा ज़िक्र हो ही जाता है















