तुम्हारे हाथ से गिरते हुए कल
वो लम्हे हो गए पल भर में पल पल
किसी गाड़ी के आगे आ गया हूँ
मैं दुनिया देखने निकला था पैदल
उदासी दाइमी रहती है मेरी
मैं हँसता रहता हूँ हर दम मुसलसल
हक़ीक़त मेरे ऊपर गिर रही है
फिर उस पे गहरा है ख़्वाबों का दल दल
इधर दरिया में कश्ती ढह गई है
उधर बरसा नहीं कोई भी बादल
मेरे चेले भी मुर्शिद हो गए हैं
मैं पागल हूँ वही सदियों से पागल
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