tumhaare haath se girte hue kal | तुम्हारे हाथ से गिरते हुए कल

  - Rahul Gurjar

तुम्हारे हाथ से गिरते हुए कल
वो लम्हे हो गए पल भर में पल पल

किसी गाड़ी के आगे आ गया हूँ
मैं दुनिया देखने निकला था पैदल

उदासी दाइमी रहती है मेरी
मैं हँसता रहता हूँ  हर दम मुसलसल

हक़ीक़त मेरे ऊपर गिर रही है
फिर उस पे गहरा है ख़्वाबों का दल दल

इधर दरिया में कश्ती ढह गई है
उधर बरसा नहीं कोई भी बादल

मेरे चेले भी मुर्शिद हो गए हैं
मैं पागल हूँ वही सदियों से पागल

  - Rahul Gurjar

Pagal Shayari

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