जो मैं समझा कहीं ये वही तो नहीं है
इश्क़ की ये जड़ें शा'इरी तो नहीं है
क्या हुआ साथ में मेरे तुम जो नहीं हो
चाँद के पास भी रौशनी तो नहीं है
ये नए दौर की नस्ल अच्छी तो है पर
फूल में पहले सी ताज़गी तो नहीं है
देख कर मैं उसे देखता ही रहा बस
तुम को इस से बड़ी बेबसी तो नहीं है
— Ankit Raj















