सब बनता है मेरे हाथों से मगर एक तेरी सूरत नहीं बनती

अपनी तस्वीर दे देता तू अगर तो ये भी ज़रूरत नहीं बनती

कुछ तो मसला चल रहा है दिल और दिमाग के बीच में
वो ख़्वाबों वाली लड़की क्यूँ हक़ीक़त नहीं बनती

कभी साथ किनारे बैठ कर काटते हैं दरिया कि रवानी को
पल-दो-पल की मुलाक़ातों से अब तबीयत नहीं बनती

जिस की आँखों में उजाला हो अनगिनत चराग़ों का
अंधेरे से आँख चुराने की फिर उस की निय्यत नहीं बनती

बीच दरिया कश्ती काटकर बना रहे हों पतवार जो
दुआ बनती है उन को मगर कोई नसीहत नहीं बनती

— Rajnish

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