अजब इतिहास लिखकर बैठा हूँ मैं

नदी की प्यास लिखकर बैठा हूँ मैं

गिरेगी ओस की बूँदें यक़ीं कर
मरुस्थल घास लिखकर बैठा हूँ मैं

बदन से रूह तक चर्चा रहेगा
वो इक एहसास लिखकर बैठा हूँ मैं

जिसे मैं जीत कर भी हार बैठा
उसी को ख़ास लिखकर बैठा हूँ मैं

भटकता फिर रहा खाने कमाने
ये क्या वनवास लिखकर बैठा हूँ मैं

— Ranjan Kumar Barnwal

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