
करे मिलने मिलाने की ही अब जद्दोजहद भी क्यूँ
निभाए जो न जाए तो करें ऐसे अहद भी क्यूँ
मिले ख़ैरात में गर इश्क़ तो मंज़ूर नफ़रत है
दिलों में है ज़हर तो फिर ज़बाँ पर है शहद भी क्यूँ
— Ravi 'VEER'
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