वहाँ से रौशनी की इक नदी निकलती है

जहाँ-जहाँ से तिरी पालकी निकलती है

मिरे नसीब में तू इस तरह निकल आए
किसी ग़रीब की ज्यूँ लॉटरी निकलती है

किसी के साथ ज़रूरी है घर बसाना भी
भला सराए में क्या ज़िंदगी निकलती है

ज़माने-भर में तअ'ल्लुक़ कमाए हैं उस ने
कहीं भी जाता है तो दोस्ती निकलती है

इसी लिए मैं कोई और बात करता नहीं
तुझे जो देखूँ तो बस शा'इरी निकलती है

— Rehan Mirza

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