हम सरीख़े शायरों का 'इश्क़ ठुकराए कोई
हुस्न पाया है तो अब यूँँ भी न इतराए कोई
क्लास से बाहर निकलता था घड़ी मैं देखकर
ठीक ऐसे वक़्त पर जब आके टकराए कोई
फिर नहीं मुमकिन यहाँ से उस तरफ़ को लौटना
शर्त पहले जान ले फिर इस तरफ़ आए कोई
इस तरह उसने हमारे गाल पर बोसा दिया
जिस तरह बच्चे को टॉफी देके बहलाए कोई
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