मियाँ इतना भी मीठा बोलना अच्छा नहीं होता

बुरे लोगों को अच्छा बोलना अच्छा नहीं होता

पुराना मशवरा है यार हाकिम को ये समझाओ
ज़रूरत से ज़ियादा बोलना अच्छा नहीं होता

मोहब्बत में निगाहों से चलो कुछ गुफ़्तगू कर लें
ज़बाँ से ही हमेशा बोलना अच्छा नहीं होता

मुझे डर है हुकूमत एक दिन ये भी न कह डाले
बनाओ ख़ुद को गूंगा बोलना अच्छा नहीं होता

हमारा नाम भी लेना जब उस का नाम लेना तो
बिना मोहन के राधा बोलना अच्छा नहीं होता

भरोसा हो भले कितना मगर है तो भरोसा ही
किसी से राज़ दिल का बोलना अच्छा नहीं होता

भरो हूँकार है हिम्मत तो आ कर सामने मेरे
कि यूँ पीछे से धावा बोलना अच्छा नहीं होता

चमक उसपर भले कितना भी आ जाए मगर प्यारे
किसी पीतल को सोना बोलना अच्छा नहीं होता।

— Rituraj kumar

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