वो मोहब्बत से वार करता रहा
मैं कि बस जाँ-निसार करता रहा
ज़िंदगी ख़ुश-गवार करता रहा
सब्र पर इख़्तियार करता रहा
एक-तरफ़ा था मेरा प्यार मगर
पूरी शिद्दत से प्यार करता रहा
काम करने को थे बहुत फिर भी
मैं तेरा इंतिज़ार करता रहा
घर का वो इक चराग़ बुझने तक
रौशनी बेशुमार करता रहा
इक तसव्वुर ही रात दिन मुझको
उम्र भर बे-क़रार करता रहा
मैं भी सचमुच ही कितना पागल था
आप पर एतिबार करता रहा
क्या कमाने की जुस्तुजू में वो
इश्क़ को दरकिनार करता रहा
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