ले के मंज़िल की आस बैठा है
वो मेरे आस-पास बैठा है
आप मसरूफ़ हो मेरे ग़म में
आप का ग़म उदास बैठा है
घर में जो आम सा मुलाज़िम है
बन के दफ़्तर में ख़ास बैठा है
एक पंछी रिहा हुआ जब से
एक पिंजरा उदास बैठा है
वस्ल में भी करें तकल्लुफ़ क्यूँ
इश्क़ तो बे-लिबास बैठा है
सब को जब आज़मा चुके होंगे
लौट आना ये दास बैठा है
वो भी कुछ याद कर के रोता है
दिल में ऐसा क़यास बैठा है
रात अब रात ही नहीं लगती
आँख में वो उजास बैठा है
सब के इरशाद पर 'सलिल' चुप था
अब लिए इक़्तिबास बैठा है
— Surendra Bhatia "Salil"















