सफ़र में हाथ छोड़े जा रहा है
तू कैसे ख़्वाब तोड़े जा रहा है
अभी पहचान भी पाया नहीं मैं
तू अपनी शक्ल छोड़े जा रहा है
ख़बर आगे ही बढ़ती जा रही है
हर इक दो चार जोड़े जा रहा है
ख़ुदा भी ना-ख़ुदा भी मेरी कश्ती
भँवर की ओर मोड़े जा रहा है
अभी तो इश्क़ की बस इब्तिदा थी
अभी से दिल ये दौड़े जा रहा है
सलिल आ जाएगा ढब शा'इरी का
अभी क्यूँ आस छोड़े जा रहा है
— Surendra Bhatia "Salil"















