ये रिश्ता अब तो उन से काग़ज़ी रक्खा नहीं जाता
था पहले शक सा अब तो लाज़िमी रक्खा नहीं जाता
समझदारी की उन से आस रखना ज़्यादती होगी
वो जिन से मूड भी अपना सही रक्खा नहीं जाता
कभी तो खार भी आएँगे मेरे दिल के पौधे में
हमेशा ख़्वाब बस फूलों का ही रक्खा नहीं जाता
वकीलों को दलीलों और अपनी जीत से मतलब
गवाहों में मगर क़ातिल कभी रक्खा नहीं जाता
चलो फिर शाम को बैठें कहीं पर चाय पीते हैं
सियाही के बिना तो हर्फ़ भी रक्खा नहीं जाता
— Surendra Bhatia "Salil"















