“कल से रश्क”
अपने कल से मुझे आज रश्क हो रहा है
हर सुब्ह ज़िन्दगी की इक नई सी जुस्तुजू
हर पहर दौड़ने की चाहतों से गुफ़्तगू
क्यूँ नहीं कुछ पल को थम के
क्यूँ नहीं कुछ पल को जम के
वक़्त ये ले चलता मुझे
फिर से उसी पल में नम से
क्यूँ न फिर से जी लूँ मैं
उन्हीं कल के दायरों में
फिर से ग़ज़ल गुनगुनाऊँ
इश्क़ के मुशायरों में
ख़याल से ही दिल का दरिया अश्क हो रहा है
अपने कल से मुझे आज रश्क हो रहा है
— Surendra Bhatia "Salil"















