मुझ को अब ख़ातम-ए-लैला का नगीं होना है
मसनद-ए-इश्क़ पे फिर तख़्त नशीं होना है
दिल भी उस शख़्स पे धड़का है कि जिस को मेरा
लाख कोशिश हो मगर फिर भी नहीं होना है
मेरी ख़्वाहिश है कि वो बाम-ए-फ़लक तक पहुँचे
उस की ज़िद है कि उसे ज़ेरे-ज़मीं होना है
ज़िंदा रहना है तो बेदीं की तरह ज़ीस्त गुज़ार
क़ाबिल-ए-जुर्म यहाँ साहब-ए-दीं होना है
यूँ न टुक देख नज़र भर के मेरी जाँ कि मुझे
तेरी आँखों में नहीं दिल में मकीं होना है
— Salman ashhadi sahil















