आप चाहें मारो ठोकर डोर को फुट-मैट को
पड़ गई है आप की आदत हमारे फ्लैट को
गिफ़्ट की थी बर्थ-डे पर जो तुम्हें मैं ने कभी
चाँद पहने घूमता है रात-भर उस हैट को
कुछ इमोजी वॉलपेपर पर पड़े रह जाएँगे
फोन से जितना मिटा लो चाहें मेरी चैट को
इक मुसलसल कश्मकश में हूँ बिछड़ कर आज तक
भूल पाया हूँ कहाँ अब तक तिरी दिस-दैट को
याद में उभरे न फिर वो डूबता सूरज कभी
भूल जा उस शाम को हिल-टाॅप को सन-सैट को
— Sandeep Thakur















