"विधाता"
न पूछ मुझ से तू हाल दिल का
न पूछ मुझ से कि कौन हूँ मैं
न पूछ मुझ से कि मैं कहाँ हूँ
मैं एक ज़र्रा हूँ दर-ब-दर सा
तेरी ही राहों में हूँ मैं उलझा
तेरी ही चाहत में हूँ मैं धुँदला
न पूछ मुझ से तू हाल दिल का
कि धूप से कब तलक मैं छुपता
कि छाँव को कब तलक मैं तकता
सो मैं चला हूँ तेरी ही जानिब
तू आख़िरी सच तू ही विधाता
— Sanjay Bhat















