
पिघलती है ये क़तरा क़तरा रंग अपना बदलती है
तिरी गर्मी की जुंबिश से तमन्ना भी फिसलती है
जवानी ख़त्म हो जाती है नादानी में जल जल के
दिल-ए-नादाँ को बिल-आख़िर ये मिट्टी ही निगलती है
— Sanjay Bhat
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