वक़्त मिरे हिस्से की मिट्टी खींच गयागर्द से और धुएँ से मुझ को सींच गयामैं खिलता भी तो क्या खिलता आँगन मेंवो ज़ालिम हस्ती भी मेरी भींच गया— Sanjay Bhat