Savan
Savan
Ghazal

क्या अब तलक वो एक आस बाक़ी है

इस दर्द का कोई मिरास बाक़ी है

गुल हो चुके हैं सब चराग़ अब मेरे
अब भी कहीं कोई उजास बाक़ी है

वो जा चुके जो दिल मिरा दुखाते थे
अब कौन मेरा इख़तिसास बाक़ी है

सच है कि सुब्ह-ओ-शाम बात करते हैं
पर बात जो है एक ख़ास बाक़ी है

इस के परे तो है सहर नई 'सावन'
बस एक ये ही तो अमास बाक़ी है

— Savan

More by Savan

Other ghazal from the same pen

See all from Savan →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling