“इंतिज़ार”
दिल में इक याद-ए-ग़ुबार है चले आओ
हाँ चले आओ
मुझे मालूम है कि कुछ ज़्यादा नहीं
तेरे आने का कोई वा'दा नहीं
मगर फिर भी
हम ऐसे मुंतज़िर हैं जैसे कोई
आ रहा है
आने ही वाला है
जैसे आ गया
— SHABAN NAZIR
दिल में इक याद-ए-ग़ुबार है चले आओ
हाँ चले आओ
मुझे मालूम है कि कुछ ज़्यादा नहीं
तेरे आने का कोई वा'दा नहीं
मगर फिर भी
हम ऐसे मुंतज़िर हैं जैसे कोई
आ रहा है
आने ही वाला है
जैसे आ गया
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