मैं मुत्मइन नहीं हूँ जी इस मशवरे के साथ

बस लाज़िमी असीरी है अब कटघरे के साथ

दो आशिक़ों को अपने झगड़ते ही देख वो
अब चल दिया है देखो किसी तीसरे के साथ

वो शख़्स जाते जाते सही बात कह गया
है ज़िंदगी गुज़रती नहीं मसख़रे के साथ

इक आदमी जो घर पे कभी हँसता ही नहीं
पकड़ा गया है हँसता हुआ कैमरे के साथ

गर तू नहीं तो क्या तेरी यादें तो साथ हैं
अपनी तो कट रही है इसी आसरे के साथ

खाँसाबियत का दोस्त है कुछ मसअले अलग
बनती नहीं है सबकी तो हम से खरे के साथ

— Shadab khan

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