ख़िज़ाँ का दौर हो या हो बहार का मौसम

मेरे लिए नहीं कोई क़रार का मौसम

किसे ख़बर थी बिछड़ कर न मिल सकेंगे कभी
न ख़त्म होगा तेरे इंतिज़ार का मौसम

ग़रज़ का दौर है सब को हैं अपनी अपनी धुन
किसी को रास न आया पुकार का मौसम

ढला है हुस्न तो मशहूर बेवफ़ाई हुई
गुज़र गया है तेरे इंतिज़ार का मौसम

उड़ाए फिरती है आवारगी की आंधी हमें
हमें नसीब कहाँ ज़ुल्फ़-ए- यार का मौसम

बुझे हैं 'रेख़्ता' हम तो बुझे नज़ारे हैं
उदास उदास लगा हुस्न -ए-यार का मौसम

— Rekhta Pataulvi

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Udasi Shayari

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