मेरे सुख़न से लतीफ़े तराशे लोगों नेकि ज़हर भी तो हँसी में उगल रहे हैं लोगइसी में रेख़्ता अब ख़ैर है कि ख़ार बनोवो देखो फूलों को कैसे मसल रहे हैं लोग— Rekhta Pataulvi