बस्ती सुख़न की ऐसे है बस मीर के बग़ैर
बेकार जैसे आँखें हैं तनवीर के बग़ैर
देखा है मैंने शाख़ पे मुरझाए फूल को
बेचैन दिल है ख़्वाब की ताबीर के बग़ैर
भर जाए दिल तो 'इश्क़ का पहला उसूल है
तर्क-ए-तअल्लुक़ात हो ताख़ीर के बग़ैर
आवाज़ आ रही है ये सहरा से क़ैस की
राँझा नहीं जिएगा कभी हीर के बग़ैर
तेरे लिए तबीब 'अजब है मगर है सच
ज़ख़्मी जिगर किया गया शमशीर के बग़ैर
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