चल अब ये क़सम खा के बता ख़ैमा-ए-दिल में
हम दर्द मेरा कोई न था ख़ैमा-ए-दिल में
इक दिन ये 'अजब शोर हुआ ख़ैमा-ए-दिल में
सब जल गया कुछ भी न रहा ख़ैमा-ए-दिल में
दहलीज़-ए-मोहब्बत पे तड़पते हुए जज़्बे
मैं छोड़ के वापस न गया ख़ैमा-ए-दिल में
ऐसे न मरे घुट के कोई जैसे मरे हम
जज़्बात ये करते हैं दुआ ख़ैमा-ए-दिल में
ग़श खा के शजर गिरने लगे ख़्वाब ज़मीं पर
जब जज़्बे की मय्यत को रखा ख़ैमा-ए-दिल में
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