हक़ बयाँ करते हुए तन से उतर जाते हैं
फिर बयाँ करने को हक़ नेज़े पे सर जाते हैं
परचम-ए-इश्क़ लिए क़ैस की मानिंद जवाँ
पुर ख़तर राहों पा बे ख़ौफ़ ओ ख़तर जाते हैं
साथ तुम थे तो नहीं डरते थे तूफ़ानों से
अब तो पत्तों के खड़कने से भी डर जाते हैं
कूचा हो जाता है खु़शबू से मोअत्तर सारा
जिस भी कूचे से वो होकर के गुज़र जाते हैं
यार कुछ लोग हैं जो मर के भी जी उठते हैं
और कुछ लोग शजर जीते जी मर जाते हैं
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