ham zamaane se juda apna chalan rakhte hain | हम ज़माने से जुदा अपना चलन रखते हैं

  - Shajar Abbas

हम ज़माने से जुदा अपना चलन रखते हैं
हिज्र की आग में ख़ुद दिल का बदन रखते हैं

ख़्वाब के पानी से होने नहीं देते सैराब
अपनी आँखों को सदा तिश्ना-दहन रखते हैं

लूट लेती है ख़िज़ाँ आन के रौनक़ सारी
बाग़बाँ ख़ुद कहाँ वीरान चमन रखते हैं
'इश्क़ के दश्त में क्यूँ ख़ौफ़ हो बर्बादी का
चश्म की पुश्त पे अश्कों का कफ़न रखते हैं

बे वफ़ाओ को बुरा कहते हैं हम महफ़िल में
आप किस वास्ते माथे पे शिकन रखते हैं

इनकी तौक़ीर को सब लोग खड़े हो जाएँ
ख़ाना-ए-दिल में शजर हुब्ब-ए-वतन रखते हैं

  - Shajar Abbas

Paani Shayari

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