jab hamaara 'ishq ik gul par ayaan hone laga | जब हमारा 'इश्क़ इक गुल पर अयाँ होने लगा

  - Shajar Abbas

जब हमारा 'इश्क़ इक गुल पर अयाँ होने लगा
तो जिगर गुलशन में ख़ारों का धुआँ होने लगा

जब से मेरी जाँ मैं तेरा राज़-दाँ होने लगा
दुश्मन-ए-जाँ मेरा मेरी जाँ जहाँ होने लगा

सहन-ए-दिल में आमद-ए-जान-ए-तमन्ना हो गई
सहन-ए-दिल देखो मेरा बाग़-ए-जिनाँ होने लगा

हज़रत-ए-आदम की जब औलाद हैं हम सब तो फिर
क्यूँँ फ़ुलाँ इब्न-ए-फ़ुलाँ इब्न-ए-फ़ुलाँ होने लगा

दास्तान-ए-ग़म बता जान-ए-वफ़ा किससे कहें
दर्द-ए-दिल दर्द-ए-जिगर अब दर्द-ए-जाँ होने लगा

नाम पे अब 'इश्क़ के मिटती है जिस्मों की हवस
ख़त्म सच्चे 'इश्क़ का नाम-ओ-निशाँ होने लगा

तू दिफ़ा करना दिल-ए-नाज़ुक की मेरे किबरिया
जानिब-ए-राह-ए-मोहब्बत दिल रवाँ होने लगा

हसरत-ए-दीदार-ए-जान-ए-जाँ की ख़ातिर देखिए
क़ल्ब मेरा दोस्तों क़ल्ब-ए-तपाँ होने लगा

ख़त्म सारे देखिए आसार-ए-महशर हो गए
आफ़्ताब-ए-हश्र नज़रों से निहाँ होने लगा

मुब्तिला है सोच में ये देख के दुनियाँ शजर
क्यूँँ मुसल्ला चादर-ए-आब-ए-रवाँ होने लगा

  - Shajar Abbas

Cigarette Shayari

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