जनाब-ए-नूह के जैसी मुझे हयात भी दे
विसाल-ए-यार हो जिस
में कोई वो रात भी दे
सुख़नवरी के हुनर से मुझे नवाज़ दिया
मेरे इलाही मुझे अब ग़ज़ल-सिफ़ात भी दे
ख़ुदा ने तुझको नवाज़ा है हुस्न-ए-मुतलक़ से
तो अपने हुस्न की थोड़ी सी तू ज़कात भी दे
अता किया है जिसे तूने चाँद सा चेहरा
नज़र में उसकी इलाही कुछ इल्तिफ़ात भी दे
शब-ए-दराज़ में गुज़री है सारी उम्र-ए-शजर
मेरे शजर को ख़ुदाया शब-ए-बरात भी दे
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