जो कोई कर नहीं सकता है बशर हमने किया
दिल से उतरे हुए लोगों में गुज़र हमने किया
इस क़दर अश्क़ बहाए हैं गम-ए-फ़ुर्क़त में
खुश्क़ सहरा थे ये सहराओ को तर हमने किया
एक अफ़राद की ख़ुशियों के लिए देखो ज़रा
पुरख़तर राहों पे ख़ुश होके सफ़र हमने किया
ज़ुल्फ़ें चेहरे से हटाकर वो सर-ए-बाम आए
और फिर दोस्तों दीदार-ए-क़मर हमने किया
दिल जलाकर कोई अपना ये सदा देता है
तीरगी थी यहाँ रौशन ये नगर हमने किया
कर दिया क़ैद से आज़ाद उड़ानों के लिए
इन परिंदों को हक़ीक़त में निडर हमने किया
अश्क़ आँखों से निकलने लगे ये कहते हुए
ज़ब्त जब तक थी तो आँखों में ठहर हमने किया
हू-ब-हू 'इश्क़ सुनो ऐसे ही करना हैं तुम्हें
जिस तरह 'इश्क़ मेरे लख़्त-ए-जिगर हमने किया
रख लिया लीजिए हमने भी नसीहत का भरम
आपके जैसे ही लो 'इश्क़ पिदर हमने किया
रो पड़ी सीने से लगकर मेरे ये कह के शजर।
आपको याद हर इक शाम-ओ-सहर हमने किया
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