क्यूँ तुमको मेरी बात पे दिलबर यक़ीं नहीं
इस दो जहाँ में तुमसा कोई भी हसीं नहीं
ऐ मेरे मह-लक़ा ऐ मेरे हम-नशीं नहीं
जो ज़ेर-ए-आसमाँ है वो ज़ेर-ए-ज़मीं नहीं
नफ़रत है इंतिशार है और बे वफ़ाई है
उलफ़त अमन सुकून जहाँ में कहीं नहीं
पूछा जो दिल से 'इश्क़ के मक़तल चलोगे क्या
दिल दफ़अतन ये तेश से बोला नहीं नहीं
मेरा तअर्रुफ़ उसने कराया कुछ इस तरह
दुनिया में इस शजर सा कोई हम नशीं नहीं
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