यार कोई तो बता दो के किधर लगता है
वो जो फ़िरदौस के मानिंद शहर लगता है
हिज्र के बाद हक़ीक़त में मेरी शहज़ादी
अब मुझे जीना ज़माने में ज़रर लगता है
जाने क्या बात हुई है तेरी हिजरत से सनम
मुझको वीरान मोहब्बत का नगर लगता है
दर्द क़िर्तास पे लिखना कोई आसान नहीं
दर्द लिखने के लिए ख़ून-ए-जिगर लगता है
मैं जो महफूज़ हूँ दुनिया की मुसीबत से सुनो
ये मुझे उसकी दुआओं का असर लगता है
ऐ मेरे ख़्वाबों की रानी ऐ मेरी जाने वफ़ा
तेरा चेहरा मुझे मानिंद-ए-क़मर लगता है
हाल मत पूछ मेरे क़ल्ब की तन्हाई का
इतनी तन्हाई है तन्हाई को डर लगता है
अपनी सखियों से वो ख़ुश हो के कहा करती थी
सबसे अच्छा मुझे कॉलेज में 'शजर' लगता है
मारते हैं ये जहाँ वाले उसी पर पत्थर
जिस शजर पर भी मेरे यार समर लगता हैं
कर दे सय्याद तू आज़ाद क़फ़स से इनको
बिन परिंदों के ये वीरान शजर लगता है
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