ये तुमको ख़ुद नहीं मालूम यार क्या हो तुम
सुकून-ए-दिल हो मेरी आँखों की ज़िया हो तुम
मेरी नमाज़ों में माँगी हुई दुआ हो तुम
ख़ुदा की सिम्त से मेरे लिए हिबा हो तुम
अदाएँ नाज़ करें जिस पे वो अदा हो तुम
मेरे लबों की हँसी मेरी दिलरूबा हो तुम
कभी कभी ये लगे है हो तुम ख़ुदा का ख़याल
कभी कभी ये लगे है मुझे ख़ुदा हो तुम
नमाज़ पढ़ के जो दिल से दुआ निकलती है
हमारे दिल से वो निकली हुई दुआ हो तुम
दिल-ओ-दिमाग़ जिगर फ़िक्र में हो मेरी बसी
मता-ए-जान फ़क़त जिस्म से जुदा हो तुम
भला क्यूँँ बैठी हो ख़ामोश बज़्म-ए-इशरत में
बताओ क्या हुआ किस बात पर खफ़ा हो तुम
ख़ुशी है इसकी कि शामिल हो मेरी ख़ुशियों में
मगर मलाल है इसका के बे रिदा हो तुम
कभी कभी मुझे महसूस ऐसा होता है
जो बे गुनाह को मिलती है वो सज़ा हो तुम
हसीन लाख हो सूरत से मेरी जान मगर
हो बे ज़मीर हो कमज़र्फ बे हया हो तुम
बताओ क्या मैं लिखूँ तुमको अपनी ग़ज़लों में
मैं लिखना चाहूँ तो लिक्खूँगा बेवफ़ा हो तुम
कोई लहू से शजर पर ये रोज़ लिखता है
हमारे दर्द-ए-जिगर की शजर दवा हो तुम
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