यूँँ सारी दुनिया से नफ़रत मिटाता रहता हूँ
शजर ख़ुशी के मैं हर सू लगाता रहता हूँ
उदास देख के मुझको कोई उदास न हो
ये बात सोच के मैं मुस्कुराता रहता हूँ
कहीं अँधेरा न हो जाए शहर-ए-हमदम में
मैं बस ये सोच के दिल को जलाता रहता हूँ
बा नाम-ए-हज़रत-ए-शब्बीर दिल के आँगन में
मैं फ़र्श-ए-मजलिस-ओ-मातम बिछाता रहता हूँ
कोई तो आके मेरे साथ ग़म को बाँटे शजर
फिराक़-ए-यार मैं तन्हा मनाता रहता हूँ
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