zamaane bhar men nafrat rah gaii hai | ज़माने भर में नफ़रत रह गई है

  - Shajar Abbas

ज़माने भर में नफ़रत रह गई है
सियासत ही सियासत रह गई है

मेरी बर्बादियों में सब हैं शामिल
तुम्हारी सिर्फ़ शिरकत रह गई है

इरादा कर चुका हूँ ख़ुदकुशी का
फक़त तेरी इजाज़त रह गई है

मैं गुल की पत्तियाँ चूमूँ लबों से
मेरे दिल में ये हसरत रह गई है

ज़माने भर को इन आँखों ने देखा
बस इक तेरी ही सूरत रह गई है

जहाँ कल तक थी ख़ुशहाली वहाँ पे
महज़ वहशत ही वहशत रह गई है

मोहब्बत जिस्मों का इक खेल है अब
मोहब्बत कब मोहब्बत रह गई है

शिकायत करना अब तुर्बत पे आकर
अगर कोई शिकायत रह गई है

जुदाई बरसों पहले हो चुकी है
दिलों में फिर भी चाहत रह गई है

शजर सब छोड़ दीं हैं आदतें अब
हाँ बस सिगरेट की आदत रह गई है

  - Shajar Abbas

Hasrat Shayari

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