हज़ारों दर्दोॆ को दिल में दबा रहे हैं हम
हज़ारों ज़ख़्म हैं जिनको छुपा रहे हैं हम
पलट के फिर नहीं आएँगे अब तुम्हारे शहर
शहर से आज अहद कर के जा रहे हैं हम
वो जा रही है किसी और की दुल्हन बनकर
और उसको देख के आँसू बहा रहे हैं हम
तुम्हारी याद दिलाते हैं ये हमें हर दम
तुम्हारे सारे ख़तों को जला रहे हैं हम
ये लग रहा है उस इक शख़्स को गवाँते हुए
कि जैसे दोस्तों दुनिया गवा रहे हैं हम
किया था 'इश्क़ जब हम दोनों ने बताओ हमें
ग़म-ए-फ़िराक़ क्यूँ तन्हा मना रहे हैं हम
किसी ने ख़त में ये अश्कों से लिख के भेजा है
पलट भी आओ ख़ुदारा बुला रहे हैं हम
हमारे दर्द पे देती है दुनिया दाद शजर
ग़ज़ल में हाल-ए-दिल अपना सुना रहे हैं हम
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