मैं दास्तान तुम्हें 'इश्क़ की सुनाता हूँ
जो गुज़रा साथ में मेरे वो सब बताता हूँ
है इक हसीन सी लड़की के जिस सेे शिद्दत से
मैं 'इश्क़ करता हूँ इज़हार कर न पाता हूँ
दवा में अपनी समझता हूँ उसके चेहरे को
उसे मैं देख के दुःख में भी मुस्कुराता हूँ
ख़ुदारा लिख दे उसे तू मेरे मुक़्क़दर में
दुआएँ माँगने मस्जिद में रोज़ जाता हूँ
लतीफ़ इतनी है यारों फ़क़त इसी डर से
बिखर न जाए यूँँ छूने से हिचकिचाता हूँ
कोई तो नाता है गहरा बहुत के जिस के सबब
मैं आँखें मूँदूँ तो ख़्वाबों में उसको पाता हूँ
अजीब क़िस्सा मोहब्बत का है शजर देखो
वो जब भी रूठता है मैं उसे मनाता हूँ
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