याँ शाह जिसके लिए शाह से लड़ा हुआ है
वो तख़्त-ओ-ताज मिरे ज़ेर-ए-पा पड़ा हुआ है
रुख़-ए-हसीन है उसका वो उसपे इक तिल है
वो माहताब पे कौकब नहीं जड़ा हुआ है
जो हो सके तो उठा लाना लाशा-ए-दिल को
बुरीदा हाल सर-ए-दश्त वो पड़ा हुआ है
ये ज़ख़्म क्या है सितम क्या है मत बताओ उसे
जो ज़ख़्म खा के सितम सह के ही बड़ा हुआ है
बताओ नज़रों की बातों में आन कर पागल
क़ुलूब हुस्न की तक़लीद पर अड़ा हुआ है
ख़ुदा तो अम्न का पैग़ाम दे रहा है शजर
ख़ुदा के नाम पे फिर क्यूँ जहाँ लड़ा हुआ है
सितम की तेज़ हवा आप थक के गिर गई है
शजर का हौसला देखो शजर खड़ा हुआ है
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