ये सोचकर मैं परेशाँ हूँ आज क्या न किया
तमाम दिन ढला और तेरा तज़किरा न किया
सनम को हमने सनम ही रखा तमाम हयात
सनम को हमने कभी दोस्तों ख़ुदा न किया
बस अपनी ज़ीस्त में लिक्खा फ़िराक़ क़ुदरत ने
कभी विसाल गवारा तेरा मेरा न किया
किया था आपने वा'दा मेरे तहफ़्फ़ुज़ का
मलाल आपने वा'दा मगर वफ़ा न किया
तुझे बसा लिया क़ल्ब-ए-हज़ीं की धड़कन में
कभी भी ख़ुद से तुझे एक पल जुदा न किया
हर इक को दे दी जगह दिल में तुमने हँसते हुए
खुला रखा ये कभी बंद रास्ता न किया
फ़रेब-ओ-रंज-ओ-सितम और फ़िराक़ सहते रहे
कभी किसी से शजर आपने गिला न किया
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