
मुनकिर-ए-इश्क़ के सीने से निकलता है धुआँ
जानिब-ए-कू-ए-बुतां मेरे क़दम उठते हैं
रोक लेती हैं वो आँखों का इशारा देकर
उन की महफ़िल से अगर जाने को हम उठते हैं
— Shajar Abbas
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