
ये क्यूँ ज़रदार सारे देख कर करते नहीं हैं ग़म
किसी के चश्म क्यूँ ये देख कर होते नहीं हैं नम
ज़माना हो गया हम को जवानी ढलने वाली है
लिबास-ए-मुफ़्लिसी बचपन से ओढ़े फिर रहे हैं हम
— Shajar Abbas
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