“नज़रें”

है रोटी पे भूखे फ़क़ीरों की नज़रें
है रंजिश है साज़िश मिज़ाजों की नज़रें
सफ़ेदी पे ख़ूनी लिबासों की नज़रें
गुमानों गुनाहों ग़ुलामों की नज़रें
है काले दिलो की ये काली सी नज़रें

है गूंगी है बहरी है अंधी ये नज़रें
है भूखी है नंगी है प्यासी ये नज़रें
हाँ हैवान रातों की रानी ये नज़रें
सताएँ हुओं की, हारी सी नज़रें
है काले दिलो की ये काली सी नज़रें

ये बनते बिगड़ते समाजों की नज़रें
ये लाशों की ख़बरों पे चोरों की नज़रें
छिपे आस्तीं में सपेरों की नज़रें
ख़लाओं में रोती नवाओं की नज़रें
है काले दिलो की ये काली सी नज़रें

जवानी रवानी को ख़ूँ में बहाती
भरोसे पे झूठी कटारे चलाती
चुराती छिपाती ये ख़ुद को बचाती
अनाओं से अपनी सभी को डराती
है काले दिलो की ये काली सी नज़रें

है सिक्कों कि खन-खन पे लोगों की नज़रें
है पायल की छन-छन पे साज़ो की नज़रें
हवस की है दामन पे चेहरों की नज़रें
बुलाती है बेटों को माँओं की नज़रें
है काले दिलो की ये काली सी नज़रें

— Shivansh Singhaniya

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